14 December 2017

मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको...

[ कथादेश के नवम्बर 2017 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का नौवाँ पन्ना ]

शामें सर्द होने लगी हैं | जाने कब से अटका हुआ...जाने का नाम ही नहीं ले रहा था कमबख्त़ सितम्बर ये | यूँ लग रहा था कि मुई तेरह हज़ार फिट की अम्बर-चुम्बी ऊँचाई इस सितम्बर को इतना भाने लगी है कि अक्टूबर को आने का रास्ता ही नहीं देगी ये | मगर आ ही गया अक्टूबर आख़िरकार...दूर नीचे ढ़लान से हाँफता हुआ...सितम्बर को परे धकेलता | कभी-कभी लगता है जैसे कि जाने कब से यहीं हूँ...इसी पहाड़ पर मोर्चा जमाये | कहीं और भी था क्या मेरा वजूद इससे पहले ? या कि सृष्टि की शुरुआत से यहीं हूँ मैं ? किससे पूछूँ ? बारह सौ जवानों और पंद्रह-सोलह ऑफिसरों का ये भरा-पूरा कुनबा भी मानो इस विराट फैले एकांत के लिए कम पड़ता है कई बार | किसी कुनबे की सरदारी से विकट एकाकी काम और कोई नहीं होता होगा शायद ! बंकरों से आता हुआ हर टेलीफोन कॉल्स... रेडियोसेट पर का हर संदेशा शरुआत में सीने को खटका ही देता है, जब तक पहले “ऑल ओके” ना कह दिया जाए | किसी रोज़ कमबख्त़ ये ह्रदय एकदम अचानक रुक ही ना जाए अंदेशों के बोझ तले इस निपट एकांत में !  कितनी बेकार-सी मौत होगी ना वो ! सितम्बर के महीने में ये मृत्यु-गन्ध किस क़दर पूरे जिस्म पर पसीजी-सी चिपकी रहती है | विगत आठ सालों से कुछ ज़ियादा ही उदास करता आ रहा है ये महीना...इस एकांत को तनिक और-और विस्तृत करता हुआ साल-दर-साल |

उदासी एक लम्हे पर गिरी थी...सदी का बोझ है पसरा हुआ सा | देखते-देखते आठ साल हो गए सुरेश को विदा कहे | हाँ...आठ साल ही तो ! सुरेश...सुरेश सूरी...मेजर सुरेश सूरी...कि जिसका होना तो शौर्य को चलते-फिरते परिभाषित करना था... लेकिन जिसका ना होना नियति ने तय कर रखा था कहीं-ना-कहीं अपनी फ़ेहरिश्त में जैसे मेरे होने के लिए | कितना आसान हो जाता है ना सब कुछ, जब हम मान लेते हैं कि ऐसा होना तो लिखा ही हुआ था...डेस्टिनी ! फिर मृत्यु तो ख़ुद ही नियति ठहरी पूरी-की-पूरी अपने होने में ! अभी उस रोज़ जब कैप्टेन राकेश ने पूछा था सुरेश का ज़िक्र आने पर कि “कैसा लगता है सर मौत के उन आख़िरी क्षणों में”...तो हँसी आ गयी थी मुझे | मौत का आख़िरी क्षण ? मौत का कोई भी क्षण आख़िरी कैसे हो सकता है ? जीवन...ज़िन्दगी का आख़िरी क्षण होता है | मौत का तो बस वो एक ही क्षण होता है ना...पहला क्या और आख़िरी क्या ?

उस दिन सारे के सारे ऑफिसर मुझसे उस आठ साल पहले वाले सितम्बर की कहानी सुनना चाहते थे | मैं फिर से टाल गया था और उसी टाले जाने के एवज में वो सवाल मिला था...कैसा लगता है मौत के आख़िरी क्षणों में | हँसी आयी थी, लेकिन पल भर में ख़ुद ही सहम कर गायब हो गयी थी वो कमबख्त़ हँसी...कि ज़िक्र सुरेश का हो रहा हो तो इस हँसी की हिमाक़त कि आए ! इन आठ सालों में लगभग हर रोज़ ही तो जी उठता है और फिर-फिर मृत्यु को वरण करता है वो स्मृतियों के क्रूर पटल पर | यूँ-होता-तो-यूँ-ना-होता या फिर ऐसे-ना-किया-होता-तो-वैसा-ना-होता वाले हज़ारों-लाखों विकल्पों को उधेड़ता-बुनता मन सुरेश को हर बार वापस ज़िंदा करता है और वापस मारता है | उसके लिए तो शायद कोई क्षण आया ही नहीं आख़िरी जैसा...ज़िन्दगी का या फिर मौत का ही | वो आख़िरी क्षण तो आख़िर में चिपका रह गया मेरे वजूद संग ही...मेरी नियति बन कर | राकेश के उस सवाल पर अब सोचता हूँ तो याद आता है कि ख़ून से तर-ब-तर जिस्म को उस रोज़ क्या-क्या ख़याल आ रहे थे | पहला तो यही था कि सुरेश ज़िंदा है...अभी सब ठीक हो जाएगा...कि ये एक दु:स्वप्न मात्र है जो नींद से जागते ही मिट जाएगा | दूसरा कि मेरे नहीं रहने के बाद छुटकी अपने पापा के बिना कैसे बड़ी होगी ! कुछ और भी उलटे-सीधे से ख़याल...एक पूरी तरह सुनियोजित ऑपरेशन का यूँ अप्रत्याशित रूप से इस तरह करवट लेने पर ग़ुस्सा...जिस्म से टपकती ख़ून की बूंदों पर ग़ुस्सा...ख़त्म होती रायफल की गोलियों पर ग़ुस्सा | उन आख़िरी क्षणों में शायद ग़ुस्सा ही सबसे चरम भाव था | एक फ्लैश-सा पूरी ज़िन्दगी का आँखों के सामने से गुज़रना जैसा कुछ...हा ! वो शायद फिल्मों में ही होता है |

ये कहना कि शरीर में चुभी हुईं गोलियाँ उतना दर्द नहीं देतीं जितना एनेस्थिशिया देने के बावजूद डॉक्टरों की कैंची से उसी शरीर से बाहर निकाली जा रही गोलियाँ देती हैं...ऐसा कुछ कहना पोएटिक होगा या रियलिस्टिक ? इस डायलॉग पर देर तक हँसे थे सारे ऑफिसर उस दिन और उनकी वो हँसी पहली बार सितम्बर के महीने में भी सकून दे रही थी | मे बी...जस्ट मे बी दैट द पेन इज फायनली एक्सेप्टिंग द माईट ऑव डेस्टिनी ! कई-कई बार मन करता है कि फोन करूँ सुरेश के घर...आन्टी से बात करूँ देर तक...उन्हें बताऊँ अपने मन में चलतीं इन तमाम पोएटिक या रियलिस्टिक सी उधेड़-बुनों को | एक शायद वहीं तो हैं इस पूरी पृथ्वी जो इन उधेड़-बुनों की तह तक पहुँच सकें | लेकिन फिर हिम्मत नहीं होती ! कुछ अजीब-सा धुक-धुक करने लगता है सीने की गहरी तलहट्टियों में कहीं...कुछ-कुछ वैसी ही धुक-धुकी जो उस रोज़ उठी थी सीने में, जब गोलियों की आवाज़ चारों ओर से उठने लगी थी अचानक ही |

अभी...अभी के अभी दूर किसी अन्तरिक्ष से आती हुई गोलियों की आवाज़ें मानो ड्रम-बीट का पार्श्वसंगीत प्रदान कर रही हों जिस पर क़दमताल करती फिर रही हैं ये स्मृतियाँ ! स्मृतियाँ...सुरेश...सितम्बर...सब के सब ‘स’ से ही क्यों शुरू होते हैं ? सितमगर सितम्बर...हा ! व्हाट अ क्लीशे’ !!

गुलज़ार की नज़्म याद आती है...

मौत तू एक कविता है
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको
डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
ज़र्द सा चेहरा लिये जब चाँद उफ़क़ तक पहुँचे
दिन अभी पानी में होरात किनारे के क़रीब
ना अंधेरा ना उजाला होना अभी रात ना दिन
जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आए
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको


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11 December 2017

इक रास्ता है ज़िन्दगी जो थम गए तो कुछ नहीं...

 [ कथादेश के अक्टूबर 2017 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का आठवाँ पन्ना ]

सर्द सीलन भरे पत्थरों से बने इस बंकर से दूर, इस बेजान एके-47 के कुंदे से परे, इस ऊँचे पहाड़ की भेदती हवाओं से कहीं हटकर...चाहता हूँ बँट जाना मैं भी बेतरतीब-सी कुछ पंक्तियों में छोटे-बड़े, ऊपर-नीचे लिखे हुये चंद जुमलों में, तमाम  बंदिशों से आजाद, उन्मुक्त, बदहवाश...कि समेट सकूँ खुद की कविता में पापा की बिगड़ती तबीयत, माँ की व्याकुल पेशानी वाली सिलवटें, बारुद की गंध, रेत भरी बोरियों से बने सरहद पर के ये सारे मोर्चे, दीपिका पादुकोण की मुस्कुराती आँखें, कुछ लड़कियों के भूले-बिसरे नाम, अपनी इकलौती छुटकी की खिलखिलाहट और ढ़ेर सारी...ढेर-ढेर सारी छुट्टियाँ...ये सब कुछ एक साथ |

कितना मुश्किल है सबको...किसी को भी समझा पाना कि ड्यूटी पर मुस्तैद खड़े सिपाही के लिए कई बार छुट्टी के बारे में सोचना तक गुनाह जैसा लगता है...

...कि मेरे विराम में भी चलना निहित था और तुम देखते रहे बस ठहराव मेरा

...कि उन क्षणों का आर्तनाद जिन्हें तुम स्वप्न में भी नहीं चाहोगे सुनना और जिन्हें भोगना था मेरी नियति, भोगने की चीख़ नहीं सुनी तुमने...नियति की किलकारियाँ सुनी

...कि प्रतिबद्धताओं की नई परिभाषायें लिखने में टूटी उँगलियों से लिखा नहीं जाता जवाब तुम्हारे सवालों में छुपे आरोपों का

...कि सच तो ये है कोई मायने नहीं रखता ये देखना, ये सुनना, ये सवाल उठाना

...कि जब पिता की विलुप्त होती स्मृतियों में भी नहीं रहता शेष मेरा समर्पण या मेरा शौर्य, किंतु बचा रह जाता है मेरी वाजिब अनुपस्थितियों का ग़ैरवाजिब निकम्मापन !

और फिर यूँ ही ययाति का क़िस्सा याद आता है देर रात के इन फैले-फैले सरहद के आशंकित रतजगों में पापा के बारे सोच कर | अपने ही श्वसुर और दैत्यों के गुरू शुक्राचार्य के क्रोध से उपजे शाप से ग्रसित हो असामयिक बुढ़ापे को पाकर, ययाति ने जाने किस मानसिक विचलन में आकर अपने पाँच पुत्रों से उनके यौवन के हिस्से की उधार-याचना की थी कभी प्राचीन काल में । बचपन में पढी हुई कहानी में जितना याद आ रहा कि शायद पाँच पुत्रों में से सबसे छोटा वाला, पुरू, ही तैयार हुआ था पिता की इच्छा पूरी करने को । इसी कहानी से एक आवारा-सी सोच अपना सर उठाती है यूँ ही कि इस चकित करने वाले तकनीकी-युग में विज्ञान के पास भी ऐसा कोई जुगाड़ होता काश कि रक्त-दान, अंग-दान की तरह ही कोई पुत्र अपने पिता को खुद के यौवन का हिस्सा भी दान कर पाता...! आह ये सारे ‘काश’ !!!

रतजगों की तासीर भी जाने कैसे-कैसे ‘काश’ बुनती रहती है !

इधर पता चला कि कल रात देर तक...बहुत देर तक छींकता रहा था वो सलेटी-सा पसरा हुआ पत्थर | हाँ, वही पत्थर...वो बड़ा-सा, जो दूर से ही अपने आकार और अपने सलेटीपने की बदौलत एकदम अलग सा नजर आता है उतरती ढ़लान पर, जिसके ठीक बाद चीड़ और देवदारों की श्रृंखला शुरू हो जाती है और जिसके तनिक और आगे जाने के बाद आती है वो छद्म काल्पनिक समस्त विवादों की जड़, वो सरहद नाम वाली रेखा | हाँ, वही सलेटी-सा पसरा हुआ पत्थर, जिस पर हर बार या तो किसी थकी हुई ‘दोपहर’ का या किसी पस्त-सी ‘शाम’ का बैठना होता है गश्त से लौटते हुये ढाई घंटे वाली खड़ी चढ़ाई से पहले सांस लेने के लिए और सुलगाने के लिए विल्स क्लासिक की चौरासी मीलीमीटर लम्बी नन्ही-सी दंडिका |

...कैसे तो कैसे हर बार कोई ना कोई घबड़ायी-सी पसीजी हुई आवाज आ ही जाती है गश्त खत्म होने के तुरत बाद पीछे आती गश्त की टोली से "वहाँ उतनी देर तक बैठना ठीक नहीं साब, दुश्मन स्नाइपर की रेंज में है वो पत्थर और फिर उन सरफ़िरों का क्या भरोसा" | हम्म... सच ही तो कहती हैं वो पसीजी-सी आवाजें | लेकिन जाने कैसा तो भरोसा उस पत्थर का है, उस पत्थर पर के सलेटी पड़ाव का है, उस चंद मिनटों वाली अलसायी बैठकी का है, उन चीड़ और देवदारों की देवताकार (दैत्याकार नहीं) ऊंचाईयों का है और उस धुआँ उगलती नन्ही-सी दंडिका का है | कौन समझाये लेकिन उन घबड़ायी-सी पसीजी हुई आवाजों को ! बस एक अरे-कुछ-नहीं-होता-वाली मुस्कान लिए हर बार वो थकी-सी ‘दोपहर’ या वो पस्त-सी ‘शाम’ सोचने लगती है कि अगली बार शर्तिया उस पत्थर की पसरी हुई सलेटी-सलेटी छाती पर ग़ालिब का कोई शेर या गुलज़ार की कोई नज़्म लिख छोड़ आनी है | क्या पता उस पार से भी कोई सरफ़िरी दोपहर या शाम आये गश्त करते हुये, पढे और जवाब में कुछ लिख छोड जाये...!!!

कितने सफ़े
हुये होंगे दफ्न
पत्थर की चौड़ी छाती में

कोई नज़्म तलाशूँ
कोई गीत ढूँढ लूँ
कि
एक सफ़ा तो मेरा हो... 

...और कल की ‘शाम’ गश्त से लौटते समय बारिश में नहाई हुई थी | ढाई घंटे की चढ़ाई जाने कितनी बार फिसली थी ‘शाम’ के कदमों तले और हर फिसलन ने मिन्नतें की थीं ‘शाम’ से कि ठहर जाओ रात भर के लिए यहीं इसी पत्थर के गिर्द ठहरना तो मुश्किल था ‘शाम’ के लिए...हाँ, वो चंद मिनटों वाला पड़ाव जरूर कुछ लंबा-सा हो गया था...कि बारिश की बूंदों से गीली हुई चौरासी मीलीमीटर वाली विल्स क्लासिक की उस पतली-दुबली नन्ही दंडिका ने बड़ा समय लिया सुलगने में और उस देरी से खीझ कर पानी भरे जूतों के अंदर गीले जुराबों ने तो ज़िद ही मचा दी थी | ज़िद...जूतों से बाहर निकल पसरे पत्थर पर थोड़ी देर लेट कर उसकी सलेटी गर्मी पाने की ज़िद | सुना है, देर तक चंद नज़्मों की लेन-देन भी हुई जुराबों और पत्थर के दरम्यान | जुराबें तो सूख गई थीं...वो लेटा सा सलेटी पत्थर गीला रह गया था |

...और देर तक छींकता रहा था वो पत्थर कल रात...पसरी-सी सलेटी-सलेटी छींकें !

दूर वाले मोर्चे से संतरी-ड्यूटी पर खड़े नायक महेश के गाने की आवाज़ आ रही है...

जाते हुए राही के साए में सिमटना क्या
इक पल के मुसाफ़िर के दामन से लिपटना क्या
आते हुए कदमों से, जाते हुए कदमों से
भरी रहेगी रहगुज़र जो हम गए तो कुछ नहीं
इक रास्ता है ज़िन्दगी जो थम गए तो कुछ नहीं



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04 December 2017

स्वधायै स्वहायै नित्यमेव भवन्तु...

स्मृतियों के पन्ने एकदम से मचलते हैं और शुरुआती कुछ पन्नों को छोड़ कर बारिश से सराबोर एक पन्ना खुलता है | उस रोज़ बारिश ऐसी थी...ऐसी थी बारिश कि गाँव की पगडंडियाँ बह रही थीं | 

कितने साल बीत गए उस झमट कर उमड़ी बरसात के ? गिनता है वो लड़का उँगलियों पर तो गिनती तीस पर जाकर थमकती है | तीस साल से कुछ ज़्यादा ही तो शायद...

...भीगे पन्ने से बहती हुयी एक पतली पगडंडी पर चलती हुई आपादमस्तक भीगी हुई स्मृति की बूँदों-सी टपकती कोई खिलखिलाहट बगल के पोखर की मछलियों को एक अजब ही उछाल दे रही है | आदेशनुमा आमंत्रण मिलता है लड़के को पिता की ओर से बाहर चलने का | किलक भरी हँसी को हैरानी हो रही है कि हैरत भरी हैरानी की हँसी छूट रही...ये तय कर पाना बहुत ही मुश्किल है फिलहाल सर्दी-जुकाम और टॉन्सिल से अक्सर ग्रसित रहने वाले और अमूमन बारिश में भीगने पर घोषित पाबंदी में बंधे उस लड़के के लिए | देखता है वो पिता के एक हाथ में काले रंग का छाता और दूजे हाथ में सफ़ेद डोर से लिपटी हुई बाँस की एक बहुत ही लम्बी छड़ी | छ: फीट लम्बे पिता के साथ डग भरता हुआ लड़का बहती पगडंडी पर छै-छपाक करता हुआ चलता है | 

बारिश को जैसे हड़बड़ी सी मची हुई है पिता-पुत्र की जोड़ी को भिगोने की और छाता बंद पड़ा पिता के हाथों में उपेक्षित महसूस कर रहा है | दस मिनट से ऊपर की वो तर-बतर पदयात्रा बगल के पोखर पर जाकर संपन्न होती है | बाँस की वो लम्बी छड़ी एक नपे-तुले झटके के साथ अपने जिस्म पर लिपटी सफ़ेद डोर को खोलती है और पिता के कुरते की जेबी से निकली हुई आटे की गुल्ली डोर के दूसरे सिरे से लगी काँटे में जा उलझती है | लड़का आँखे फाड़े देखता है सारी प्रक्रिया...पिता के लम्बे हाथों की उड़ान से नियंत्रित पीछे से घूम कर उठती हुई सफ़ेद डोर को पोखर के पानी में डूबते...और उसी डोर के पानी में डूबे सिरे से बंधी कुछ ही क्षण बाद एक मछली को बाहर आते हुए | प्रक्रिया तीन बार दोहराई जाती है और अब तक उपेक्षित बंद पड़ा छाता आधा खुलता है और अपने उदर में तीन मछलियों को समाहित कर वापस बंद हो जाता है | 

बहती पगडंडी पर वापसी की यात्रा अपने साथ के एक अजब-ग़ज़ब से रोमांच को लिए लड़के की स्मृतियों में क़ैद हो जाती है |

सालों बाद...तीस-साल-से-कुछ-ज़्यादा-ही-तो-शायद के बाद...उसी पोखर की घाट पर पंडितों द्वारा उच्चरित “ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च मह्योगिभ्य एव च नम: स्वधायै स्वहायै नित्यमेव भवन्तु” को दोहराता हुआ वो लड़का पोखर की नयी मछलियों की उछाल देखता है और समस्त देवताओं से प्रार्थना करता है उस झमट कर उमड़ी हुई बरसात में भीगते छ: फीट लम्बे पिता के साथ डग भरते हुए छै-छपाक की वापसी के लिए | 

[sketch curtsey Sheree from watercoloursplus.com]

06 November 2017

चाँद का नीला रिबन गुम है...

पसीने में पिघलते पस्त दिन की सब थकन गुम है
मचलती शाम क्या आयी, है गुम धरती, गगन गुम है

भला कैसे नहीं पड़ते हवा की पीठ पर छाले
पहाड़ों से चुहलबाज़ी में बादल का कुशन गुम है

कुहासा हाय कैसा ये उतर आया है साहिल पर
सजीले-से, छबीले-से समन्दर का बदन गुम है

खुली छाती से सूरज की बरसती आग है, लेकिन
सिलेगा कौन उसकी शर्ट का जो इक बटन गुम है

उछलती कूदती अल्हड़ नदी की देखकर सूरत
किनारों पर बुढ़ाती रेत की हर इक शिकन गुम है

भगोड़े हो गए पत्ते सभी जाड़े से पहले ही
धुने सर अब चिनार अपना कि उसका तो फ़िरन गुम है

ज़रा जब धूप ने की गुदगुदी मौसम के तलवों पर
जगी फिर खिलखिलाकर सुब्ह, सर्दी की छुअन गुम है


[ पाल ले इक रोग नादाँ के पन्नों से ]


30 October 2017

दुनिया में चंद लोग होते हैं जादूगर...

[ कथादेश के सितम्बर 2017 के अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का सातवाँ पन्ना ]

सरहद की दुनिया...वो दुनिया जिसके बाशिंदे बंकरों और मोर्चों में बसते हैं...एक अजब-गजब सी ही दुनिया है । यहाँ कहकहों का बाँकपन बर्फ़़ीली हवाओं की रगों में गर्मी भरता है | यहाँ के बाशिंदों की वर्दी के हरे-भूरे छापे सर्द मौसमों के सूखे पत्तों को भी हरा करते हैं | यहाँ के रहने वाले इस व्हाट्सएप और फेसबुक की बौरायी रीत से परे अंतर्देशीय और लिफाफों में ख़त लिखते हैं अपने महबूब को और थैले भर-भर के ख़त पाते भी हैं । हफ़्ते पुराने अख़बारों पर यहाँ के बाशिंदें अपनी जानकारी ताज़ा रखते हैं और महीनों तक ताज़ा सब्जी की झलक बिना भी इन बाशिंदों का ख़ून हर लम्हा अपने उफ़ान पर रहता है ।

यहाँ के बाशिंदों द्वारा ख़ुदा के जानिब उछाले गए बेतरतीब बोसों से आसमान में सितारे टूटते हैं और इन्हीं टूटते सितारों पर दुआएँ माँगी जाती हैं नीचे सतह की शेष दुनिया के लोगों द्वारा ।

सरहद की इस दुनिया में उदासी को परमानेंट वीजा नहीं मिलता । ये ठहाकों की दुनिया है...गट्स और ग्लोरी इन ठहाकों के आगोश में सिमट कर यहाँ के मुकम्मल और स्थायी निवासी बन चुके हैं । किन्तु, इन तमाम बातों को अक्सर ही नज़रअंदाज़ कर अनवरत साजिशें बुनी जाती हैं इस दुनिया के मुकम्मल और स्थायी निवासियों को हर चंद रुसवा किये जाने की | कुछ दिन पहले की एक ऐसी ही साजिश की कहानी जब खुली, तो हैरत भी हैरान हुए बैठी रही अनंत काल तक के लिए...

...सुस्त सी धूप में कुनमुनाती हुई अलसाई सी सुबह थी वो | कश्मीर की एक आम सी सुबह, जो अपनी समाप्ति का ऐलान करते-करते दोपहर तक एक बदनाम सुबह में तब्दील हो जानी थी | उस नौजवान मेजर ने शहर के ठीक मध्य में अवस्थित विशाल और दुर्जेय सी प्रतीत होने वाली टावर-पोस्ट की कमान संभाल ली थी नींद खुलते ही हर सुबह की तरह...लेकिन इस सुबह की नियति से बिलकुल अनजान | वो टावर-पोस्ट ख़ास था बहुत...उसकी बनावट, शहर के मुख्य चौराहे पर उसका होना और चारों ओर दूर तक खुला अवलोकन उपलब्ध कराती हुईं उस टावर की खिड़कियाँ...सब मिल कर उसे एक विकट और एक बहुत ही मजबूत सैन्य-चौकी का रुतबा देते थे | उस टावर-पोस्ट का वहाँ होना सेना के आने-जाने वाले काफ़िले और अन्य सैन्य-प्रक्रियाओं के लिए एक आश्वस्ती सा देता हुआ माहौल प्रदान करता था | किन्तु इन्हीं सब ख़ास बातों को और अपनी इन्हीं खसूसियतों को लेकर, वो टावर-पोस्ट स्थानीय लोगों के एक ख़ास तबके की आँखों की किरकिरी भी बना हुआ था |

बीती दोपहर को एक अफ़वाह उड़ी थी सेना के एक जवान द्वारा किसी स्थानीय लड़की के साथ छेड़खानी की, जो कि बाद में ख़ुद ही अपने गढ़े जाने की पोल खोल गयी थी जब लड़की ने पुलिस को दिए गए बयान में सेना के उस जवान की तारीफ़ की थी | लेकिन वो बाद की बात थी...फिलहाल वो नौजवान मेजर तनिक परेशान था इस अफ़वाह से | अपनी परेशानी में भी कहीं-ना-कहीं थोड़ी सी निश्चिंतता ढूंढ रहा था वो कि उसे भरोसा था सत्य की शक्ति में | इन तमाम अफ़वाहों का इकलौता मुद्दा... स्थानीय लोगों को भड़काना और सेना की छवि को बिगाड़ना...मेजर सोच रहा था...आतंकवाद के शुरुआती दौर ने इन इलाकों में चंद सैनिकों द्वारा ज़रूर कुछ गलत हरकतों को होते देखा है...लेकिन विगत दस-बारह सालों से किसी सैनिक द्वारा की हुई ऐसी कोई गलत हरकत स्मृति-पटल पर नहीं कौंधती | इन गुज़िश्ता सालों में, सेना ने अपनी इमेज सुधारी है और नब्बे के दशक के पूर्वार्ध की शुरुआती गलतियों से सबक लेते हुए ऐसी किसी भी गलत हरकतों में लिप्त सैन्य-कर्मियों के साथ बहुत सख्ती से पेश आयी है | मेजर इन्हीं सब ख्यालों पर मन-ही-मन विमर्श कर रहा था इस अभी-अभी उडी अफवाह के पार्श्व में, जब अचानक से उसकी सोचों में एकदम से हड़कंप मचता है | टावर-पोस्ट के ठीक सामने से आती सड़क पर इकट्ठी होती स्थानीय लोगों की भीड़ एक झटके में आराम से बैठी उस सुबह को चौकन्ना कर गयी थी |

इतने सालों का प्रशिक्षण और इस आतंकवादग्रस्त इलाके का अनुभव...दोनों मिलकर नौजवान मेजर की छठी इंद्रीय को चेतावनी देते हैं | कई दफ़ा देख चुका है वो कि यहाँ भीड़ किस तरह पलक झपकते ही विकराल अवतार धर लेती है | उसके द्वारा लोकल पुलिस को संदेशा देते ही, अपनी फिल्मी अवधारणाओं के विपरीत, पुलिस वक़्त पर पहुँचती है और अब तक लगभग अनियंत्रित हो चुकी भीड़ पर अश्रु-गैस का पहला राउंड फायर करती है | सुबह की नियति...राउंड का खाली शेल भीड़ में एक व्यक्ति के सिर पर गिरता है और उसकी मौत हो जाती है | उस व्यक्ति का शव भीड़ के उन्माद को टावर-पोस्ट की तरफ मोड़ देता है | मेजर हैरत भरी आँखों से देखता है जलते हुये पेट्रोल भरे एक बोतल को भीड़ की तरफ से उड़ कर अपने पोस्ट पर गिरते हुए और उस बोतल के पीछे-पीछे आती हुई पत्थरों की बारिश | टावर-पोस्ट का एक कोना आग पकड़ चुका था...एक और पेट्रोल बम का उस जानिब आना मेजर की सहनशीलता के सामर्थ्य में नहीं था | लाउड स्पीकर पर तीन बार चेतावनी देने के बावजूद जब भीड़ का उन्माद थमता नहीं दिखता है और दूसरा पेट्रोल बम क्षणांश में नज़दीक ही आकर फटता है तो भीड़ का नेतृत्व कर रहे शख़्स की तरफ़ लक्षित करके मेज़र उसके पैरों पर एक गोली मारने का आदेश अपने सैनिक को देता है | सुबह की नियति...गोली की आवाज़ पर हड़बड़ायी भीड़ में लड़खड़ाया हुआ शख़्स पैरों की बजाय गोली अपने सिर पर लेता है |

मेजर अपने सामने उपस्थित समस्त विकल्पों को तौलता है | कुछ और लोगों की गोलीबारी में मौत की क़ीमत पर या अपने साथियों के साथ ज़िंदा जला दिये जाने की क़ीमत पर टावर-पोस्ट की रक्षा में डटा रहे या फिर...| निर्णय ने अपनी सूरत दिखाने में तनिक भी विलंब भी नहीं किया | नौजवान मेजर अपने जवानों के साथ टावर-पोस्ट को तज कर बस थोड़ा ही पीछे स्थित अपने बेस-कैम्प की सुरक्षित चारदीवारी में प्रवेश कर जाता है...प्रार्थना करता हुआ कि किसी ने पूरे घटनाक्रम की वीडियो बनाई हो |

उसे यक़ीन था कि उस पर हत्या का केस दायर होगा | वो तैयार कर रहा था ख़ुद को इन्क्वायरी-दल के सवालों का जवाब देने के लिए और साथ ही दुआ कर रहा था कि उसके चरित्र को जज़ करने वाले कोई भी हो लेकिन कम-से-कम वो लोग ना हों, जिन्हें अपने घर की परिधि में सुरक्षित बैठ कर फेसबुक-व्हाट्सएप पर न्यायाधीश बनने का शौक़ चर्राया हुआ है | सत्य को तोड़ते-मरोड़ते और अपनी कुंठा-वमन करते हुये ख़बरों की हेडलाइन कल के अख़बार में देखने से ख़ुद को बचाना चाहता था वो | लेकिन इतना तो तय था...नौजवान मेजर सोचता है... कि "सेना की फायरिंग में दो लोगों की मौत" एक बेहतर हेडलाइन ध्वनित होती है किसी भी वक़्त, बनिस्पत "उग्र भीड़ ने सेना के एक ऑफिसर और पाँच जवानों को ज़िंदा जलाया" !

...और मुझे वो नौजवान मेजर और ऐसा हर सिपाही किसी जादूगर से कम प्रतीत नहीं होता, जब भी सुनता हूँ ऐसी कोई कहानी...

कहती है ये नज़र
कब क्या हो, क्या ख़बर
दुनिया में चंद लोग होते हैं जादूगर !


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