16 October 2017

हरी मुस्कुराहटों वाला कोलाज ~ 4

"कैसे हो, गुरनाम सिंह ?"

"कुछ तो बोलो गुरनाम !"

"तुम्हारी बीवी मिलने आई है तुमसे गुरनाम !"

...मिलेट्री हॉस्पिटल का वो आईसीयू का चैम्बर विगत कुछ दिनों से लगभग इन्हीं पुकारों से लगातार गूंजायमान हो रखा था । आतंकवादियों के साथ एक मुठभेड़ के दौरान सिपाही गुरनाम सिंह के बुलेटप्रूफ पटके को किनारे से छूती हुई एक गोली उसके मस्तिष्क में प्रवेश कर अटक गई थी । एक अंतहीन-सी प्रतीत हो रही सर्जरी के बाद डाक्टरों ने मस्तिष्क के रहस्यमयी गलियारों में गुमशुदा उस गोली को तो निकाल लिया था...लेकिन सर्जरी के तुरंत बाद ही गुरनाम कोमा में चला गया था ।

अभी कुछ दिन पहले ही होश आया उसे, किंतु अभी ना तो वो किसी को पहचान पा रहा था और ना ही कोई बात कर पा रहा था । उस घातक मुठभेड़ के पश्चात गुरनाम का जहाँ जीवित बचा रह जाना ही अपने-आप में किसी चमत्कार से कम नहीं था...वहीं अभी-अभी आये कमबख़्त होश को जैसे ज़िद पड़ी थी कि उसे भी एक चमत्कार चाहिये ।

पंजाब के सुदूर गाँव से आये उसके माता-पिता और नवेली दुल्हन उस मिलेट्री हॉस्पिटल की भव्यता और डाक्टरों-नर्सों के चमकते यूनीफ़ॉर्म के मिले-जुले रौब के साये में सकुचाये से ज़ियादा कुछ बोल भी नहीं पा रहे थे । पतली-सी, दुबली-सी नई दुल्हन सिर पर दुपट्टा ओढ़े बस चुपचाप बैठी रहती गुरनाम के बेड के साथ...मुँह झुकाये टपटप आँसुओं की बारिश करते हुये ।

उधर दो दिन पहले एक और मुठभेड़ में आतंकवादियों की गोलियों से घायल हुये और इसी आईसीयू में भर्ती हुये, गुरनाम के बगल वाले बेड पर लेटे हुये लेफ्टिनेंट कर्नल साब इस बात से आशंकित थे कि दुश्मन की गोलियों से तो बच गये...लेकिन इस पतली-सी, दुबली-सी दुल्हन की आँखों से बरसता आँसुओं का ये सैलाब ज़रूर इस आईसीयू चैंबर में लेटे सारे फ़ौजियों को डूबो कर मारेगा ।

गुरनाम को कोमा से बाहर आये और उसकी गुमी हुई याददाश्त की उम्र अपने पाँचवें रोज़ पर थी, जब जम्मू से लेफ्टिनेंट कर्नल साब के बाल-सखा, एक कोई खन्ना जी, आये थे मिलने । नाटे से खन्ना जी को अपने बुलंद कहकहों और पंजाबी कल्चर पर बड़ा ही गुमान था । आम हिंदुस्तानी की तरह खन्ना जी को भी बेड पर घायल दोस्त से ज़ियादा पड़ोसियों की कहानी में दिलचस्पी थी । गुरनाम का पूरा ब्यौरा मिलते ही, जाने तो किस रौ में उठे खन्ना जी और शुरू हो गये अपनी ठेठ पंजाबी में...

"होर भारा, तेरा नाम की है ?"

चंद छोटे-छोटे कहकहों के साथ खन्ना जी ज़ारी रहे...

"ओय गुरनामsss किद्दा हो ?" हह हह हह ...यार तू कुछ बोलदा क्यों नहीं...कुछ तो बोल तुस्सी  हह हह हह !”

...और अचानक जैसे देववाणी-सी उतरी कोई स्वर्ग से । बेड पर लेटे गुरनाम के होंठों में जुम्बिश हुई...

"मेरा नाम सिपाही गुरनाम सिंह है, ते तुस्सी कौन हो...होर किथों आये हो ?"

आईसीयू के उस आठ बेड वाले चैम्बर में जैसे ख़ुशी ख़ुद ही साक्षात उतर कर कार्ट-व्हील और समर-साल्ट करने लगी थी उस वक़्त । गुरनाम को तुरत-फुरत घेर लिये डाक्टरों की टोली बस इसी निष्कर्ष पर पहुँची कि चमत्कार की प्रतिक्षा में अटकी पड़ी वो ज़िद्दी नीम-सी होशी को दरअसल गुरनाम के मातृभाषा वाले करेंट की दरकार थी ।

...उधर बगल के बेड पर लेटे लेफ्टिनेंट कर्नल साब का वो सैलाब में डूब मरने का भय एकदम से अपने चरम पर पहुँच गया था कि उस पतली-सी, दुबली-सी नवेली दुल्हन की हिचकियाँ अब तो अरसे से भरे पड़े बादलों की तरह आँसुओं की मूसलाधार बारिश करवा रही थीं ।


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"वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता" 

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09 October 2017

उड़ी बाज़ू में इक तितली तो गुब्बारा मचल उट्ठा

बंधा धागे से था फिर भी वो बेचारा मचल उट्ठा
उड़ी बाज़ू में इक तितली तो गुब्बारा मचल उट्ठा

हवा का ज़ोर था ऐसा...रिबन करता तो करता क्या
मनाया लाख ज़ुल्फ़ों ने, वो दोबारा मचल उट्ठा

उठाया सुब्‍ह ने पर्दा, तो ली खिड़की ने अंगड़ाई
गली के पार अधलेटा-सा ओसारा मचल उट्ठा

बजी घंटी, दुपट्टे खिलखिलाते क्लास से निकले
अचानक सूने-से कॉलिज का गलियारा मचल उट्ठा

बस इक उँगली छुयी थी चाय की प्याली पकड़ते वक़्त
न जाने क्यूँ समूचे जिस्म का पारा मचल उट्ठा

पुराना ख़त निकल आया, पुरानी फाइलों से जब
उठी ख़ुश्बू कि ऑफिस यक-ब-यक सारा मचल उट्ठा

छबीले चाँद ने बादल के चिलमन को उठाया यूँ
फ़लक पर ऊँघता बैठा हर इक तारा मचल उट्ठा

अकेली रात थी आधी, बुझा था बल्ब कमरे का

सुलगती याद यूँ चमकी कि अँधियारा मचल उट्ठा

[ पाल ले इक रोग नादाँ के पन्नों से ]

03 October 2017

करुणा में हमेशा एक निजी इतिहास होता है

[ कथादेश के अगस्त 2017 अंक में प्रकाशित "फ़ौजी की डायरी" का छठा पन्ना ]

रातों को जैसे खत्म ना होने की लत लग गयी है इन दिनों...बर्फ क्या पिघली, जाते-जाते कमबख़्त ने जैसे रातों को खींच कर तान दिया है | इतनी लम्बी रातें कि सुबह होने तक पूरी उम्र ही बीत जाये ! "रोमियो चार्ली फॉर टाइगर...ऑल ओके ! ओवर !" छोटे वायरलेस सेट पर की ये “ऑल ओके” की धुन इन लम्बी रातों में गुलज़ार की नज़्मों और ग़ालिब के शेरों से भी ज़्यादा सूदिंग लगती है | बंकर के कोने में उदास पड़े सफेद लम्बे भारी भरकम स्नो-बूट्स के तस्मों से अभी भी चिपके हुये दो-एक बुरादे बर्फ के, फुसफुसाते हुये किस्सागोई करते सुने जा सकते हैं...  उन सुकून भरी बर्फ़ीली रातों की किस्सागोई, जब जेहाद के आसेबों को भी सर्दी लगती थी |

...और इन लम्बी-लम्बी रातों में आकार बदलते चाँद से ही गुफ्तगू होती है अक्सर | मगर ये कमीना चाँद इतनी जल्दी-जल्दी क्यों अमावस की तरफ भागता है ? बर्फ़ पिघल जाने के बाद तो इस मुए चाँद की रौशनी की ही तो दरकार है सरहद पर चौकस निगह-बानी की ख़ातिर | इन लम्बी रातों वाले मौसम तलक भूल नहीं सकता है क्या ये बदमाश अपनी फेज-शिफ्टिंग के आसमानी हुक्म को ?

कल रात बड़ी देर तक ठिठका रहा था वो आधा से कुछ ज्यादा चाँद अपनी ठुड्ढी उठाए सरहद के उस पार पहाड़ी पर बने छोटे से बंकर की छत पर | अज़ब-गज़ब सी रात थी...सुबह से लेकर देर शाम तक लरज़ते बादलों की टोलियाँ अचानक से लापता हो गईं रात के जवान होते ही | उस आधे से कुछ ज्यादा वाले चाँद का ही तिलिस्म था ऐसा या फिर दिन भर लदे-फदे बादल थक गए थे आसमान की तानाशाही से...जो भी था, सब मिल-जुल कर एक विचित्र-सा प्रतिरोध पैदा कर रहे थे | ....प्रतिरोध ? हाँ, प्रतिरोध ही तो कि दिन के उजाले में उस पार पहाड़ी पर बना यही बंकर सख़्त नजरों से घूरता रहता है इस ज़ानिब राइफल की नली सामने किए हुये और रात के अंधेरे में अब उसी के छत से कमबख़्त चाँद घूर रहा था |  न बस घूर रहा था...एक किसी गोल चेहरे की बेतरह याद भी दिला रहा था बदमाश...

सोचा था...हाँ, सोचा तो था बताऊंगा उसको आयेगा जब फोन कि उठी थी हूक-सी इक याद उस सरहद पार वाले बंकर की छत पर ठुड्ढी उठाए चाँद को ठिठका देख कर | गश्त की थकान लेकिन तपते तलवों से उठकर ज़ुबान तक आ गई थी और
कह पाया कुछ भी तो नहीं...| सोच रहा हूँ, अब के जो दिखा बदमाश यूँ ही घूरता हुआ...उठा लाऊँगा उस पार से और रख लूँगा तपते तलवों पर स्लीपिंग बैग के भीतर | अभी जो उस गोल चेहरे वाली का फोन आये तो पूछूँ उससे...तेरी इस हूक-सी याद का उठना कुफ़्र तो नहीं चाँद को देखकर कि जब जा बसा हो वो मुआ चाँद दुश्मनों के ख़ेमे में ?

...और ये आँखें जाने क्यों नम हो आयी हैं ?

विगत हजार...दस हजार सालों से
, जब से ये हरी वर्दी शरीर का हिस्सा बनी है, इन आँखों ने आँसु बहाने के कुछ अजब कायदे ढ़ूंढ़ निकाले हैं । किसी खूबसूरत कविता पे रो उठने वाली ये आँखें, कहानी-उपन्यासों में पलकें नम कर लेने वाली ये आँखें, किसी फिल्म के भावुक दृश्‍यों पे डबडबा जाने वाली ये आँखें, मुल्क के इस सुदूर कोने में फोन पर अपनी दूर-निवासी प्रेयसी की बातें सुन कर भीग जाने वाली आँखें, हर छुट्टी से वापस ड्‍यूटी पर आते समय माँ के आँसुओं का मुँह फेर कर साथ निभाने वाली ये आँखें...आश्‍चर्यजनक रूप से किसी मौत पर आँसु नहीं बहाती हैं । अभी हफ्ते भर पहले भी नहीं रोयीं, जब नीचे जंगल में वो नौजवान मेजर सीने में तेरह गोलियाँ समोये अपने से ज्यादा फ़िक्र अपने गिरे हुये जवान की जान बचाने के लिये करता हुआ शहीद हो गया । ट्रिगर दबने के बाद दो हजार तीन सौ पचास फिट प्रति सेकेंड की रफ़्तार से एके-47 के बैरल से निकली हुई गोली जब शरीर में पैबस्त करती है तो ठीक उस वक़्त शरीर को आभास तक नहीं होता और जब तक होता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है | दरअसल शौर्य दुश्मन पर गोली चलाने या गोली खाने में नहीं है...शौर्य तो उस इरादे में है, जो ये जानते-बूझते भी कि वहाँ मौत छुपी है मगर फिर भी वो इरादे डिगते नहीं, जाते हैं उसी जानिब मौत से दो-दो हाथ करने |

शौर्य ने एक नया नाम लिया खुद के लिये...मेजर सतीश का नाम । उम्र के 27वें पायदान पर खड़ा पड़ोस के नुक्कड़ पर रहने वाला बिल्कुल एक आम नौजवान...फर्क बस इतना कि जहाँ उसके साथी आई.आई.टी., मेडिकल्स, कैट के लिये प्रयत्नशील थे, उसने अपने मुल्क के लिये हरी वर्दी पहनने की ठानी । ...और उसका ये मुल्क जब सात समन्दर पार खेल रही अपनी क्रिकेट-टीम की हार पर शोक मना रहा था, वो जाबांज बगैर किसी चियरिंग के एक अनाम-सी लड़ाई लड़ रहा था । आनेवाले स्वतंत्रता-दिवस पर यही उसका ये मुल्क उसको एक तमगा पकड़ा देगा । इस मुल्क की विडंबना ही है कि आप तब तक बहादुर नहीं हैं, जब तक आप शहीद नहीं हो जाते । कई दिनों से ये "शहीद" शब्द मुझे जाने क्यों मुँह चिढ़ाता-सा नजर आ रहा है...!!!

इस ऊँचे बर्फ़ीले पहाड़ों के नीचे, मध्य कश्मीर के राजवाड़ और हफ़रुदा के जंगलों में खड़े ख़ामोश चीड़-देवदार के दरख़्त जाने कितनी अनदेखी-अनसुनी शौर्य गाथाओं के साक्षी हैं...भारतीय सेना के अनगिनत मेजर सतीशों की शौर्य गाथायें ! बर्फ़ की बिछी हुई विस्तृत सफ़ेद चादर के मध्य सिर उठाये सिहरते ख़ामोश खड़े इन चीड़ और देवदार के गिरे हुए पत्ते और टूटी हुई टहनियों ने विगत तीन दशकों से ज़्यादा के समयांतराल में मेजर सतीश सरीखे कितने ही सैनिकों के लहूलुहान जिस्म को अपनी गोद में सम्हाला दिया है | चीड़-देवदार के ये ख़ामोश दरख़्त, जंगल से सटे गाँवों में जिहाद के नाम पर उस पार से आने वाले सरफिरों की ख़ातिरदारी में इन गाँव के बाशिंदों द्वारा अपनी बेज़ुबान रोटियों और बेटियों को परोसते भी देखते हैं...बेज़ुबान रोटियों के टूटते कौर को इनका ख़ुदा नहीं देखता और चुप सहमी बेटियों का ज़िक्र किसी फेमिनिस्ट की कविताओं या कहानियों में जगह नहीं बना पाता ! लेकिन ये मेजर सतीश सब देखते हैं ! ये सतीश जैसे युवा आराम से अपनी सैन्य-चौकी पर बैठे रह सकते हैं इन तमाम तमाशों को देखने के बावजूद कि इन सतीशों को फिर भी उनकी तनख्वाह तो मिलनी ही है...लेकिन इन सतीशों की वर्दी के कन्धों पर सितारे सजने से पहले ली गयी शपथ उन्हें बैठने नहीं देती अपने सैन्य-चौकियों की सकून भरी गर्माहट में और उठ कर चल पड़ते हैं ये बाँकुरे इन जंगलों में शौर्य की नयी परिभाषा रचने ! उधर रोटी के साथ अपनी बेटी परोसने वालों की जहालत यहीं ख़त्म नहीं होती...इनकी जहालत तो ज़ख़्मी सतीशों को अस्पताल ले जाने वाली एम्बुलेंस पर बरसती है पत्थरों की बारिश बन कर | उकता कर इन सतीशों की रूहें इनके जिस्म को छोड़ चली जाती हैं ऊपर कि उस चुप बैठे ख़ुदा से गुज़ारिश कर सके हफ़रुदा और राजवाड़ की बेज़ुबान रोटियों और बेटियों के वास्ते ! जाने ख़ुदा इन सतीशों की सुनता भी है कि नहीं ! चालीस साल तो होने जा रहे...गुजारिशों की सुनवाई की कुछ ख़बर नहीं फिलहाल !

इधर यूँ ही एक आवारा सा ख़याल अपना सर उठाता है कि...उस पार वाले बंकर के नुमाइंदों को किसी की याद आती होगी कि नहीं चाँद को अपने बंकर के ऊपर यूँ ठिठका देखकर ?  दिलचस्प होगा ये जानना... ! गीत चतुर्वेदी की एक कविता की पंक्तियाँ याद आती है-

भूख में होती है तपस्या
पानी में बहुत सारी अतृप्ति
उपकार में कई आरोप
व्याख्या में थोड़ी-सी बदनीयती
और
करुणा में हमेशा
एक निजी इतिहास होता है

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25 September 2017

मुँडेर से गिरी जो तेरी ओढनी अभी-अभी...

हवा ने चाँद पर लिखी जो सिम्फनी अभी-अभी
सुनाने आई है उसी को चाँदनी अभी-अभी

कहीं लिया है नाम उसने मेरा बात-बात में
कि रोम-रोम में उठी है सनसनी अभी-अभी

अटक के तार पर चिढ़ा रही है मुँह गली को वो
मुँडेर से गिरी जो तेरी ओढनी अभी-अभी

थी फोन पर हँसी तेरी, थी गर्म चाय हाथ में
बड़ी हसीन शाम की थी कंपनी अभी-अभी

मचलती लाल स्कूटी पर थी नीली-नीली साड़ी जो
है कर गई सड़क को पूरी बैंगनी अभी-अभी

सितारे ले के आस्माँ से आई हैं ज़मीन पर
ये जुगनुओं की टोलियाँ बनी-ठनी अभी-अभी

है लौट आया क़ाफ़िला जो सरहदों से फ़ौज का

तो कैसे हँस पड़ी उदास छावनी अभी-अभी


[ पाल ले इक रोग नादाँ के पन्नों से ]

19 September 2017

चंद चितकबरे ख्व़ाब

[ मासिक हंस के अगस्त 2017 अंक में प्रकाशित कहानी ]

क्या हुआ आज? हिला था हाथ क्या?” फुसफुसाते हुये पूछा दीपू ने| वैसे तो चारों हमेशा साथ ही आते थे, लेकिन दीपू लेट हो गया था आज...जब तक क्लास में घुसा, पंडित जी भी रोल-कॉल रजिस्टर लिए क्लास-रूम की चौखट तक आ गए थे| बबलू और मंटू के बीच में ऊँह-आह कर पैठता हुआ, पंडित जी के अपनी कुर्सी पर व्यवस्थित होने से पहले मौके का फायदा उठाते हुये अपनी हाँफती उत्कंठा को शांत करना चाहा था दीपू ने| मंटू ने ज़ोर की कुहनी मार कर उसे चुप रहने का इशारा किया, जिसे देखकर बगल में बैठा बेनी फिस्स से हँस पड़ा| पंडित जी की दाँयीं भौंह एकदम से त्रिभुजाकार होकर उठी और क्लास-रूम की सहमी-सी ख़ामोशी तनिक और सहम गई| क्षण भर बाद ही गूंजने लगी पंडित जी की बुलंद आवाज़ रजिस्टर से एक-एक नाम को पुकारते हुये, जिसके प्रत्युत्तर में प्रेजेंट सर-प्रेजेंट सर का शोर क्लास-रूम के हर कोने से टपकने लगा|

      वो पंद्रह बटे बीस का क्लास-रूम जिला स्कूल की दसवीं कक्षा का सेक्शन था, जिसमें पाँच-पाँच की दो कतार में साढ़े चार-साढ़े चार फिट लंबे कुल दस बेंच-डेस्क की जोड़ियाँ थीं| एक बेंच-डेस्क पर चार छात्र बैठते थे और पंडित जी...पंडित मुनेन्द्र मिश्र दसवीं के क्लास-टीचर थे, जिनके आतंक से उनकी क्लास के सारे-के-सारे अड़तीस छात्र भकुयाये रहते थे|  हर रोज़ चालीस मिनट वाला पहला पीरियड संस्कृत का ही होता था, जिसमें पहले सात से दस मिनट तो रोल-कॉल और अनुपस्थित छात्रों की खोज-खबर में निकल जाता और अगले दस मिनट जीवनोपयोगी उपदेश में, जिन्हें पंडित मुनेन्द्र मिश्र जी ने बड़े जतन से अपनी बयालीस साल की ज़िंदगी में अर्जित किए थे| उस रोज़ भी वही सब हो रहा था, लेकिन दीपू की नज़र बस पंडित जी के पीछे टंगी दीवार-घड़ी पर ही अटकी हुई थी| उसकी बेसब्री चालीस मिनट वाले पीरियड को युगों-सा लंबा बना रही थी| ख़ैर-ख़ैर मनाते बाहर बरामदे से टन-टन की आवाज़ दूसरे पीरियड के शुरू होने का ऐलान करते हुये आयी|
     
      “अरे चोट्टा सब ! कुछ बतायेगा कि नहीं तुमलोग रे? क्या हुआ आज? हाथ फिर हिला था?” पंडित जी की चप्पलों की फटकार क्लास-रूम से दूर जाते ही दीपू उछल कर डेस्क पर बैठता हुआ लगभग चिल्लाते हुये पूछ पड़ा|
      “तुम लसक कहाँ गया था रे? हमलोग चौक पर रुके थे बड़ी देर तुम्हारे लिये...हाँ, आज फिर से हाथ हिला था| खुश?” बबलू ने जवाब दिया|
      “बाबूजी का मोटरसायकिल का पेट्रोल खत्म हो गया था| वही भरवाने में लेट हो गए हम|”
      “अब नीचे बैठेगा तुम...अमरेन्द्र बाबू आते ही होंगे|” मंटू ने कहा|
      “तुम मीनू से पता करने का कोशिश किया रे?” बेनी ने दीपू से पूछा|
      “हिम्मते नहीं होता है| वो फट से जाकर बता देगी बाबूजी को कि भैया गर्ल्स स्कूल के बारे में पूछ रहे हैं और बाबूजी क्या हाल करेंगे हमारा, जानता तो है तुमलोग|” दीपू की विवशता बकायदा उसके चेहरे से टपक रही थी|

      बातचीत का सिलसिला वहीं थम गया कि अमरेन्द्र बाबू का आगमन हो गया था क्लास में भौतिकी पढ़ाने| दीपू की उत्कंठा थी कि हिलोरे मारे जा रही थी...खुसुर-पुसुर ब्लैक-बोर्ड पर न्यूमेरिकल्स समझा रहे अमरेन्द्र बाबू के कानों तक पहुँच ही गई और घूर कर देखा उन्होंने बाँयी वाली कतार के तीसरे बेंच की तरफ...

      “तुम चारों फिर साथ बैठा हुआ है? तुमलोग का दिमाग में एक बार में बात नहीं घुसता? उठो! उठो वहाँ से तुम चारों और अलग-अलग कोने में बैठो तुरत| अगली बार फिर से देख लिये साथ बैठे तुमलोग को तो मार-मार के हुलिया टाइट कर देंगे|”

      सकपकाये से चारों उठ कर अलग-अलग बेंचों पर जा बैठे अथाह वेदना का मुखौटा ओढ़े हुये अपने-अपने चेहरों पर...क्लास के बाकी छात्रों की दबी-दबी हँसी पर आँखों से आग्नेय-शस्त्र बरसाते हुये| ये लगभग नियमित का क्रम था| चारों का क्लास की बाँयी कतार वाले तीसरे बेंच-डेस्क पर बैठना आरक्षित रहता था हर रोज़...एक-दूजे के बिना उनकी साँस नहीं निकलती थी| स्कूल से लेकर मुहल्ले तक चारों को हमेशा साथ ही देखा जाता था| शहर के दक्षिणी कोने पर बसे पूरबिया-टोला {अब इस बारे में ये पूछना कि दक्षिणी कोने पर था तो पूरबिया-टोला क्यों, कुछ ऐसा ही सवाल होगा कि भारत के पूरब में होने पर भी राज्य का नाम पश्चिम बंगाल क्यों है} से लेकर इधर जिला स्कूल तक शायद ही कभी किसी ने इनको अलग-अलग देखा हो| वैसे भी कोसी नदी की जब-तब मिलती बाढ़ की धमकी से खौफ़ खाये इस छोटे से शहर में हर कोई हर किसी को नाम से जानता था लगभग|
     
      कमिश्नरी मुख्यालय होने के बावजूद शहर अभी अपने पंख पसार नहीं पाया था| अभी भी बस छोटी लाइन वाली ट्रेन ही आती थी यहाँ| दिल्ली, कलकत्ता जैसे बड़े शहरों को जाने के लिये इस शहर के लोगों को कोसी और गंगा नदी पार कर पटना या भागलपुर जाना पड़ता था| यहाँ सब कुछ एक अपनी तयशुदा मद्धम रफ़्तार से चलता था...किसी को कोई जल्दी नहीं थी| शाम को जल्दी सोने वाला ये शहर सुबह को देर से अलसाया जगता था| दिल्ली में पहली बार एशियाड गेम्स अभी पाँच-छ साल पहले संपन्न हुआ था तो उस चक्कर में शहर के कुछ घरों में टेलीविजन आ गये थे| उन्हीं सुस्त से अलसाये उबासी भरे दिनों में शहर के पूरबिया-टोला के ये चार लड़के अपनी छोटी आँखों में बड़े ख़्वाब पाले बहुत कुछ कर गुज़रने का सोचा करते थे|
     
      ...वैसे फिलहाल उनके इस बहुत कुछ कर गुज़रने की योजना पर एक नई अचंभित कर देने वाली घटना ने अपना प्रभाव डाला हुआ था, जिससे चारों के दिन का चैन और रातों की नींद उड़ी हुयी थी| पंख पसारने की प्रक्रिया के लिए प्रेरित हो रहे उस छोटे से शहर के लिए ये घटना अपने-आप में किसी अजूबा से कम नहीं थी...बोल्ड...बोल्ड और ब्यूटीफुल| लेकिन अलसाये शहर के दृश्य-पटल पर अभी इस तथाकथित बोल्ड और ब्यूटीफुल घटना का स्क्रीन-प्ले खुला नहीं था| ये घटना अभी तक इस चांडाल-चौकड़ी की आँखों तक ही सीमित थी| चारों अपने मुहल्ले से साथ ही पैदल चालीस मिनट चल कर स्कूल आते थे...मुहल्ले से निकलने के बाद नेशनल हाईवे को पार करना, फिर शहर के इकलौते कॉलेज के कैम्पस से होते हुये कॉलेज की पीछे वाली दीवार के एक टूटे हिस्से से शॉर्ट-कट लेते हुये ये सीधे चौक पर आ जाते थे| चौक, जिसका कोई नाम नहीं था...शहर भर में वो बस चौक के नाम से ही जाना जाता था| चौक से फिर पोस्ट-ऑफिस को बाँये छोडते हुये ये उस सड़क पर आ जाते थे, जहाँ आगे जाकर शहर का सदर अस्पताल, फिर सचिवालय, फिर कचहरी और तमाम कार्यालय आते थे| लेकिन इन सबसे पहले आता था शहर का इकलौता राजकीय कन्या उच्च विद्यालय, जिसे सब लोग अमूमन गर्ल्स स्कूल कहकर बुलाते थे और उसी से बस कुछ फलांग आगे सड़क के परली तरफ लड़कों का राजकीय उच्च विद्यालय आता था, जिसे बस जिला स्कूल कह कर बुलाया जाता था|
     
      छठी कक्षा तक वहीं पूरबिया-टोला के एक प्राइवेट स्कूल संस्कार भारती विद्या मंदिर में पढ़ने के बाद चारों आ गए थे जिला स्कूल में और विगत तीन सालों से यही दिनचर्या चल रही थी उनकी...पढ़ने में औसत से बस थोड़ा-सा आगे थे चारों और मौज-मस्ती में औसत से बहुत आगे| लेकिन स्कूल और मुहल्ले की क्रिकेट टीम चारों के बगैर मुकम्मल नहीं हो पाती थी| सब कुछ ठीक चल रहा था अभी तक...बस तीन-चार दिन पहले उनकी दुनिया उलट-पुलट हो गई थी| इस उलट-पुलट में जहाँ एक अपरिभाषित-सी गुदगुदी थी, वहीं एक अवर्णनीय रोमांच भी था...भीषण ताप के बाद बारिश की पहली बूँद के गिरने का उल्लास था और साथ ही थी रहस्य की एक चादर|
     
      हुआ यूँ कि उस दिन चारों गप्पें लड़ाते अपने स्कूल की ओर अग्रसर जब गर्ल्स स्कूल के सामने से गुज़र रहे थे तो गर्ल्स स्कूल के एक क्लास-रूम की दो खिड़कियों से, जो मुख्य सड़क की ओर खुलती थीं, दो-दो गोरे-गोरे हाथ ज़ोर-ज़ोर से हिल कर उन्हें इशारा कर रहे थे| सबसे पहले बेनी ने ध्यान दिया इस हरकत पर और उसकी चौंधियायी आँखों का पीछा करते हुये जब मंटू, बबलू और दीपू ने वो दृश्य देखा तो उनकी भी आँखें अपने कटोरों से उबल कर बाहर आने को लालायित होने लगीं| चारों स्तब्ध से कभी एक-दूसरे को तो कभी उन दो खिड़कियों से हिलते हुये उन चार गोरे-गोरे हाथों को देखते रहे| वो सम्मोहन की मुद्रा शायद यूँ ही किसी थम गए लम्हे-सी चलती रहती यदि उसी वक़्त गर्ल्स स्कूल और वहीं से थोड़ी दूर पर अवस्थित जिला स्कूल, दोनों ही स्कूल की मॉर्निंग-प्रेयर के लिए एकत्रित होने वाली घंटियाँ एक साथ बज न उठतीं| घंटी की आवाज़ पर भक्क से टूटी तंद्रा...उधर दोनों खिड़कियों से वो गोर-गोरे हाथ गायब हुये और इधर चारों के पैरों में जैसे तूफ़ान समा गया| प्रेयर के लिए देर होने का मतलब था प्रधानाचार्य की छड़ी| “तुम्हीं हो माता, पिता तुम्हीं हो” के बोल पर स्कूल के लगभग पाँच सौ छात्रों के साथ वो आँखें बंद किए हाथ जोड़े सुर तो मिला रहे थे, लेकिन ध्यान में तुम्हीं-हो-माता-पिता-तुम्हीं-हो वाले सर्वशक्तिमान न होकर गर्ल्स स्कूल की दो खिड़कियाँ थीं|

      पहले उन्हें लगा कि गर्ल्स स्कूल की लड़कियाँ यूँ ही शरारत करते हुये हर लड़कों के साथ ऐसा ही करती होंगी| लेकिन भेद खुला दो-तीन दिन की सूक्ष्म जाँच-पड़ताल के बाद कि वो चारों हाथ सिर्फ उन्हीं के गुज़रने पर हिलते थे|  विगत कुछ दिनों से लगातार आखिरी पीरियड बंक करके गर्ल्स स्कूल के गेट के इर्द-गिर्द मँडराते हुये चारों ने स्कूल से बाहर निकलती हुयी नेवी ब्लू फ्रॉक वाली तमाम  लड़कियों के चेहरे को गौर से देखते हुये एक-एक चेहरे को उन दो खिड़कियों से हिलते हाथों से मिलान करने की अथक कोशिश की, लेकिन नतीजा सिफर ही निकला| उस छोटे से शहर के अबूझ संस्कारों के बोझ तले दब कर गर्ल्स स्कूल की लड़कियों की गरदनें जो स्कूल के गेट से बाहर निकलते ही नीचे की ओर झुकतीं तो फिर वो अपने-अपने घर पहुँचने पर ही ऊपर उठतीं|
     
      रहस्य की चादर मोटी होती जा रही थी और चारों की विकलता अपने चरम पर थीं| सड़क से तकरीबन बीस-पचीस मीटर दूर स्कूल के बाउंड्री-वाल के भीतर उस क्लास-रूम की दोनों खिड़कियों से उन्हें इशारे करते हिलते गोरे-गोरे हाथों से जुड़े चेहरों की वो बस कल्पना ही कर पा रहे थे, क्योंकि बाहर की धूप क्लास-रूम के अंदर नीम-अँधेरे में कुछ भी देख पाने में असमर्थ करती थी चारों को|
ये एक नई दुनिया थी चारों के लिए, जो अभी तक किताबों और क्रिकेट के तक ही सिमटी थी| लड़कियों से संपर्क के तौर पर बस इतना ही होता था कि यदि कोई बड़े-बुजुर्ग आस-पास नहीं होते और ऐसे में रास्ते में कोई लड़कियों का ग्रुप नजर आता तो बस उन्हें सुना कर कोई प्रचलित गीत गाने लगते वो| शाम को क्रिकेट की प्रैक्टिस अब घटने लगी थी और चौक पर उनकी बैठकी बढ़ने लगी था...बाबा की विख्यात चाय की दुकान से चाय पीते हुये|
     
      नाम तो उनका वैसे राधेश्याम बाबू था लेकिन जब से चारों ने होश संभाला था, सबके मुँह से राधेश्याम के लिए बाबा का ही सम्बोधन सुनते आए थे| चारों की लगभग सारी शामें वहीं बीतती थीं| डस्ट वाली पत्ती को खूब खौला कर ढ़ेर सारा दूध मिला कर बनाई गई बाबा की चाय का स्वाद उन दिनों स्वार्गिक हुआ करता था| बाबा उनको चाय के साथ खूब सारा भाषण भी देते थे पढ़ाई-लिखाई को लेकर| वहीं बगल में बिजेन्द्र सिंह की पान की दुकान भी थी, जहाँ से वो चारों हर रोज पनामा की चार सिगरेट लिया करते थे, जिसे वो दुकान की गुमटी के पीछे छुप कर पिया करते थे और फिर बिजेन्द्र भैया से खूब सारी लौंग-इलायची खा कर घर जाते थे| बिजेन्द्र भैया का चारों के इस षड़यंत्र को बाकायदा आशीर्वाद प्राप्त था|
     
      वो सितंबर महीने के शुरुआती दिनों की कोई विचलित-सी शाम थी, जब बेनी-मंटू-दीपू-बबलू की चौकड़ी जमा हुई थी चौक पर बाबा की चाय सुड़कते हुये| सात महीने से ऊपर हो गए थे गर्ल्स-स्कूल की उन दो खिड़कियों से उनको इशारे करती चार हाथों को हिलते हुये| इन सात महीनों में वो बस इतना पता कर पाये थे कि वो दोनों खिड़कियाँ दसवीं क्लास की हैं| लड़कियों की संख्या उतनी ना होने की वजह से जिला स्कूल की तरह गर्ल्स स्कूल में कक्षाओं को सेक्शन में नहीं बाँटा गया था| ये खुलासा भी किसी तरह दीपू अपनी छोटी बहन मीनू से निकाल पाया था कैसे-न-कैसे कर के, जो गर्ल्स-स्कूल में ही नौवीं क्लास में पढ़ती थी| रहस्य की चादर अब तक खूब सारी रुई भरी रज़ाई-सी मोटी हो गई थी, लेकिन गुदगुदी का रोमांच बदस्तूर जारी था|

      “कौन है ये अपना सब का दीवानी?” लगभग रो पड़ने के अंदाज़ में पूछा बेनी ने|
      “हमलोग जैसा अभागा तो और कोई नहीं होगा इस संसार में|” दार्शनिक बबलू का उद्गार जाने कितना दर्शन समेटे हुये था|
      “दीपुआ, साला तुम कुछ कर ही नहीं रहा है| मीनू को पटाओ तो ठीक से| वही हमलोग का तारनहार बन सकती है बस|” मंटू ने झुँझलाते हुये कहा|
      “अरे यार, वो बाबूजी की पक्की चेली है| पिटवा देगी हमको| फिर भी हम  हिम्मत कर रहे हैं...पता लगा लेंगे, देखना तुमलोग|” दीपू ने आवेश में आते हुये कहा|
      “मीनू को तुमलोग इस सबसे अलग ही रखो|” अचानक से बोल पड़ा था दार्शनिक बबलू और उसके अजीब से टोन ने बाकी तीनों को लगभग चौंका ही दिया था|

      ...कोई कुछ पूछता इस बारे में कि तभी बेनी को छ-सात लड़कियों का झुंड आता दिखा और वो बिजेन्द्र भैया की दुकान पर बज रहे बड़े से टू-इन-वन में गाते गुड्डू रंगीला की सुर में सुर मिलाने लगा...

“खा लूँ तिरंगा गोरीया हो फाड़ के
बाकी अब अयह इतबार के
...जा झाड के”

क्षण भर में बाकी तीनों भी साथ में राग आलाप रहे थे...

“चोलिया में झलकेला जोबना के जाली
मन करे देखि तोहरे के खाली
जान मारे तोहरो बिंदिया लीलार के
जा झाड़ के...”

      ...उधर अचानक से लड़कियों के कदम तेज हो गए और वो लोग झट-पट वहाँ से गुज़र गयीं| चारों के ठहाके के साथ जब गाना खत्म हुआ तो बाबा की तेज पुकार आ रही थी उनके कानों में “बचवा लोग, सुधर जाओ तुम सब!” जिसकी प्रतिक्रिया में चारों धड़फड़ा कर उठे और बिजेन्द्र भैया की गुमटी के पीछे “पनामा के दमदार कश की कसम, किसी फिल्टर में कहाँ ये दम” को चरितार्थ करते हुये धुयें में बिला गये|
     
      शाम ढ़ले जब सिगरेट की महक को लौंग-इलायची चबा कर हटाते हुये चारों घर की ओर लौट रहे थे तो साथ में प्लानिंग चल रही थी आने वाले कल के शाम की...दीपू के घर में तीनों को इकट्ठा होना था वर्ष के आख़िरी ग्रैंड स्लैम यू॰एस॰ ओपेन का महिलाओं का फाइनल मैच देखने के लिये| दीपू के बाबूजी शहर के इकलौते थाना के थाना-प्रभारी थे और शहर में गिने-चुने रंगीन टेलीविजनों में बड़ा उन्नीस इंची वाला “अपट्रोन” कंपनी का टेलीविजन दीपू के घर में भी था| चारों की दिलरुबा स्टेफी ग्राफ वर्ष के बाकी तीन ग्रैंड-स्लैम पहले ही जीत कर यू॰एस॰ ओपेन को भी जीतने के कगार पर थी और नया रिकॉर्ड कायम करने वाली थी, जिसके लिये चारों बकायदा उत्सव मनाने की तैयारी में थे| इस फाइनल की थोड़ी-सी अलग मुश्किल ये थी कि इस बार के फाइनल में उन चारों की दिलरुबा का मुक़ाबला उनकी दूसरी दिलरुबा से हो रहा था...काले घने वालों वाली गैब्रियला सबातीनी से और इस वजह से उनकी मुहब्बत तनिक विभाजित सी हो रही थी|
     
      अगली शाम अपने-अपने घरों से देर रात की अनुमति लेकर मंटू, बेनी और बबलू जब दीपू के घर पहुँचे तो बाहर ओसारे पर थाना-प्रभारी श्री नित्यानन्द सिन्हा जी धोती और बाजू वाला बनियान पहने मैकडोवेल नंबर वन व्हिस्की का सेवन कर रहे थे|

      “आइये, आइये...क्या हाल है तुमलोग का? पढ़ाई-लिखाई कैसा चल रहा है?”

बबलू ने सबसे पहले बड़ी तत्परता से उनके पैर छूते हुये जवाब दिया, “सब ठीक है चाचा जी| आप कैसे हैं?”

      “खुश रहो! ये दिपुआ, चोट्टा, पढ़ता है कि नहीं ठीक से? और छ महीना बाद तुमलोग का मैट्रिक का परीक्षा है और तुमलोग यही सब मैच-वैच देख कर टाइम बर्बाद करते रहो? भर दिन तो तुमलोग को देखते हैं बैट-बॉल उठाए कॉलेज फिल्ड में नाचते रहते हो...पढ़ाई कब करते हो? ऐसा थोड़े ना चलेगा| कंपीटीशन सब बहुते बढ़ गया है| मेहनत नहीं करोगे तो यहीं सड़ते रहोगे...बाहर निकलो, अच्छा कॉलेज में जाओ, हमसब का नाम बढ़ाओ...”
     
      ...और लंबा-सा भाषण झेल कर तीनों आ गए टीवी वाले कमरे में, जहाँ पर्दे के पीछे छुपा हुआ दीपू अपनी खीसें निपोर रहा था| रात बड़ी ही नशीली-सी थी वो| स्टेफी और सबातीनी के इश्क़ में बौराये चारों की आँखें पूरे वक़्त टीवी स्क्रीन से चिपकी रहीं...हाँ, बबलू की बेचैन निगाहें जरूर लगातार अंतराल पर इधर-उधर दौड़ती रहीं| कई बार उठ-उठ कर वो आँगन वाले चापा नल तक गया, जिस पर मंटू और बेनी की टिप्पणी भी आई थी कि “बड़ा गला सूख रहा है तुम्हारा रे? स्टेफी और सबातीनी का गर्मी बर्दाश्त नहीं हो रहा क्या?” जिसके जवाब में बबलू ने दीपू से मुखातिब हो पूछा था “चाची और मीनू दिख नहीं रहे हैं? कहीं गए हैं क्या?”  ...तो दीपू ने बताया कि पड़ोस में पूजा है, उसी में गए हैं|
     
      नशीली रात खत्म हुई थी स्टेफी की सबातीनी के ऊपर
दिलचस्प जीत के साथ और चारों की उल्लासमय चित्कार पर अंदर से थाना-प्रभारी साब का हुमकता हुआ हुंकार आया था “चोप्पsss !!!” का, जिसने एक झटके में सारा हैंग-ओवर उतार दिया उनका| चारों सकपका कर चुप हो गए और फिर खुस-फुस देर तक ये बातें चलती रहीं कि इसी महीने के आख़िर में होने वाले सिओल ओलंपिक में भी अगर स्टेफी गोल्ड मेडल जीत जाती है, तो कैसा अद्भुत कीर्तिमान होगा ये|
     
      दिन यूँ ही बीतते जा रहे थे| देखते-देखते साल अपने समापन पर आ गया था| दिसंबर के ठिठुराते हुये दूसरे हफ्ते की बात होगी, जब उन चारों की विकलता एकदम काबू से बाहर हो गई थी| अगले हफ्ते से स्कूल बंद हो जाने थे और फिर तो मैट्रिक बोर्ड की परीक्षा देने ही स्कूल आना था| उनकी तमाम दुआओं और मन्नतों की बदौलत उनकी दिलरुबा स्टेफी सिओल ओलंपिक में तो गोल्ड मेडल जीत गई थी, लेकिन वहीं दूसरी ओर वही मन्नतें गर्ल्स स्कूल की खिड़की से हिलते हाथों वाले चहरे से नकाब उठाने में कामयाबी नहीं दिलवा पायी थीं| नैराश्य का कोई साक्षात आकार यदि होता था, तो ये इन दिनों उन चारों को देखकर समझा जा सकता था| वो हताशा का चरम ही था या उत्सुकता की हद ही थी कोई, जब चारों ने स्कूल बंद होने वाले हफ़्ते के शुक्रवार को सड़क लांघ कर गर्ल्स स्कूल की बाउंड्री कूदते हुये उन दो खिड़कियों के करीब पहुँचने की जुगत में थे| सब कुछ एक अजीब से अफरा-तफरी में हुआ था...मन्टू और बेनी बाउंड्री वाली दीवार पर चढ़ चुके थे, बबलू नीचे खड़ा था और दीपू थोड़ा सा झिझका हुआ पीछे सड़क के किनारे| गर्ल्स स्कूल के उस क्लास रूम के नीम-अँधेरे से लड़कियों की सामूहिक चित्कार आई थी| नहीं, उस चित्कार में कहीं भी खौफ़ जैसा कुछ नहीं था...कुछ भी था तो था एक गुलाबी-से आश्चर्य और एक लाल-पीले कौतुक का मिश्रण और इस बात की ताकीद चारों कसमें खा कर कर सकते थे| लेकिन उसी वक्त दुर्योग से अपनी राजदूत मोटरसाइकिल पर विराजे किसी काम से सचिवालय जा रहे शहर के इकलौते थाना के थाना-प्रभारी साब के कानों आई वो चीखें कुछ और ही फ़साना गढ़ रही थीं| राजदूत को वहीं रोकते हुये, आनन-फानन अपने इकलौते सुपूत्र को कनमोचरी देते हुये जो उन्होंने हुंकार लगाई तो नीचे खड़ा बबलू आँधी-तूफान की तरह ये ले-वो ले हो गायब हो गया, लेकिन दीवार के ऊपर चढ़े मंटू और बेनी को उसी दीवार ने मानो जकड़ लिया था| दीपू की तो ख़ैर थाना-प्रभारी साब ने वो धुलाई की कि बेचारा “धोये गए कुछ ऐसे कि बस पाक हो गये” वाला गालिब का मिसरा हो गया| शेष तीनों की करतूत का आँखों देखा हाल सुनाने थाना-प्रभारी साब खुद एक-एक के घर गये| पूरे शहर में चारों निकम्मे-नकारे-कुपात्र घोषित हो चुके थे|
     
      ...और इस तमाम धूम-पटक में रहस्य की वो चादर मोटी-सी रज़ाई बनी रह गई| देर रात गये पढ़ाई से ऊब उठे मन को वापस तरोताजा करने के लिए खिड़की से हिलते उन गोरे-गोरे हाथों की स्मृतियाँ ही थीं शेष अब, जो रिवाइटल कैप्सूल का काम करती थीं आने वाली परीक्षा की तैयारी के लिये| मैट्रिक की परीक्षा के परिणाम ने चारों की उधड़ी हुई इज्जत पर कुछ पैबंद लगाने का काम किया कि चारों ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुये थे| यूँ पटना साइंस कॉलेज में दाखिले और इस कस्बेनुमा शहर से निकलने का ख़्वाब बस ख़्वाब ही रह गया कि वहाँ के लिए कट-ऑफ मार्क्स की लक्षमण-रेखा से थोड़ा नीचे झूल रहे थे उनके अंक| इंटरमिडिएट की पढ़ाई के लिए शहर का इकलौता कॉलेज, श्री ललित नारायण महाविद्यालय, ही बैतरनी बना फिर| वो गर्ल्स स्कूल वाली दुर्घटना ज़रूर उनके लिए टर्निंग प्वाइंट साबित हुई कि गणित लेकर आई॰आई॰टी॰ को लक्ष्य {जिसकी एक और वजह चार साल पहले बेनी के बड़े भाई पवन माधव झा द्वारा शहर का पहला आई॰आई॰टियन बनना भी था} मानते हुये चारों कुछ गंभीर हुये थे और रेसनिक हेलिडे के न्यूमेरिकल्स से लेकर जोशी एंड जोशी के केमिस्ट्री के सोल्यूशन्स में डूबे रहते थे अब दिन-रात| टीस बस इस बात की थी कि गणित वाले ग्रुप में एक भी लड़की नहीं थी कॉलेज में...सारी की सारी लड़कियाँ डॉक्टर बनने का सपना लिए बायोलॉजी ग्रुप में थी| कभी-कभार फिजिक्स और केमिस्ट्री के कॉमन क्लास आयोजित हो जाते थे तो उनका दिन बन जाता था|
     
      चितकबरे ख़्वाबों वाले नीले-नीले दिनों के कैनवास में अपने-अपने रंगों की कूची चलाते वो परिपक्व हो रहे थे| बचपना अब भी गया नहीं था कि लड़कियों के बँटवारे को लेकर युद्ध का उद्घोष जब-तब होते रहता कॉलेज कैम्पस में| “शालू हमारी है, गुड्डी तुम्हारी है और रंजू उसकी है” की दुदुंभी जब तब परिस्थिति अनुसार अपनी धुन बदलती रहती थी| उसी दिन रास्ते में गुड्डी का रुमाल गिर गया था,जिसे उठा कर इतराते हुये बायोलॉजी ग्रुप वाले निशिकांत ने वापस किया था और दोपहर को फिजिक्स के प्रैक्टिकल में आकर उसने बकायदा धमकाते हुये मंटू से कहा था कि वो गुड्डी को भूल जाये...वो आज से निशिकांत ठाकुर की हो गई है| अच्छा घमासान हुआ था उस दिन शाम को कॉलेज फील्ड में, जब क्रिकेट प्रैक्टिस को रोक कर विकेटों से सर फोड़ दिया गया था निशिकांत ठाकुर का| बेचारी गुड्डी इन सब से अनभिज्ञ कि उसके नाम पर क्रिकेट के बल्ले और विकेट प्रागैतिहासिक हथियारों का काम कर रहे हैं, अगले दिन के लिए तैयार हो रही थी कि दरभंगा से लड़के वाले आ रहे थे उसे देखने के लिए|

      “हमलोग मिल कर अख़बार निकालेंगे| साला, इस शहर से एक ठो अख़बारो नहीं निकलता है|” उसी शाम निशिकांत को उसकी औकात बताने और गुड्डी पर वापस अपनी मुहर लगा लेने के बाद चौक पर बाबा की चाय की सुड़की लगाते हुये मंटू ने दूर क्षितिज को देखते हुये कहा था|
      “हाँ, और उसमें एक ठो स्पेसल पेज होगा तुम्हारे लिए कि तुम्हारी गुड्डी डार्लिंग तक तुम्हारा मन का बात पहुँचे|” दीपू ने ठहाका लगाते हुये कहा|
      “और उसमें हमलोग पर्दाफास करेंगे रणजी ट्रॉफी के लिए बिहार की टीम-चयन में हुआ धांधली का| चोट्टा, निगोड़ा अरूणबा सेलेक्ट हो गया जिसको हम हर ओवर में दो बार आउट कर सकते हैं, काहे कि बाप विधायक है|” बेनी का आक्रोश जानलेवा था|
      “पहले हमलोग कोई कंपीटीशन निकाल लें, फिर करेंगे ये सब|” बबलू हमेशा की तरह दार्शनिक था|
      “एक ठो विचार ये आया मन में कल कि हमलोग पैसा मिला कर मद्रास वाला ब्रिलिएंट ट्यूटोरियल्स से कॉरेस्पोंडेंस मंगाते हैं आई॰आई॰टी॰ का| हर साल ब्रिलिएंट का बहुते कैंडीडेट सब निकालता है आई॰आई॰टी॰| क्या कहता है तुमलोग?”
      “बात तो ठीक कह रहा है मन्टुआ| अगर ब्रिलिएंट वाला दो साल का पूरा पैकेजबा घोंट लें, साला कोई माय का लाल नहीं रोक सकता हमलोग को आई॰आई॰टी॰ जाने से| तुम्हारा पवन भैया भी तो ऐसे ही निकाले थे ना, बेनिया रे?” बबलू तनिक उत्तेजित होता हुआ बोला|
      “हाँ, बात तो ठीक कह रहा है तुम...और पता है, पवन भैया तुम्हारी दीदी पे लाइन मारते हैं|” बेनी ने कुछ ठहर-ठहर कर कहा|
      “जानते हैं हम...और उसको लाइन मारना नहीं, प्यार करना कहते हैं बुरबक|” बबलू वापस अपने दार्शनिक अवतार में आ गया था|
      “ठीक कह रहा है बबलुआ| लाइन तो साला हमलोग मारते हैं हर लड़की पर| लेकिन पवन भैया का सेंटीमेंटल वाला प्यार है|” दीपू ने अपना ज्ञान बघारा|
      “हाँ, जैसे हम सेंटी हैं मीनू पर|” अचानक ही निकल गया था बबलू के मुँह से ये और वो सकपका कर चुप हो गया तुरत ही|
     
      ...एक भयानक-सी चुप्पी पसर गई चौक पर बैठी मंडली में, जो दूसरे ही पल बेनी और मंटू के टूटते ठहाकों से खंड-खंड हुई और दीपू की बबलू के लिये चुन-चुन कर निकाली हुई गालियों से| बड़ी मुश्किल से हिम्मत जुटा कर थोड़ी-सी झेंपी-झेंपी हँसी के साथ बबलू कहने लगा... “अब चुप हो जाओ तुमलोग| रे दीपुआ, बचपन से प्यार करते हैं हम मीनुआ को और तुम्हारा थानेदार बाप को भी हम अच्छे लगते हैं सबसे ज्यादा तुम तीनों में| तुम्हारा दोस्त तुम्हारा जीजा बन कर आ जायेगा घर में तो तुम्हारे लिए ही अच्छा रहेगा ना| और कोई दहेज-वहेज भी नहीं लेंगे हम...”

      उस शाम देर तक इस मुद्दे पर बात चलती रही थी| तमसाए दीपू को समझाने में बड़ा वक़्त लगा तीनों को, लेकिन मजलिस के उठने तक और पनामा के आख़िरी दमदार कश तक दीपू ने बबलू को अपने होने वाले जीजा के तौर पर स्वीकार्य कर लिया था| उधर वो चौक जाने क्यों उनकी इन बातों पर देर तलक मंद –मंद मुस्कुराता रहा था|

      वक़्त बीतता रहा यूँ ही...कि उसके बीतते रहने में ही उसका वजूद है| दिन, महीने की गिनती नहीं आती उसे, लेकिन उस चौक को इतना ज़रूर याद है कि स्टेफी ग्राफ को वो गोल्डेन ग्रैंड स्लैम जीते चौबीस साल से ऊपर हो गए हैं और आज उसकी बुढ़ाती उम्र का बचपना लौट आया है| बचपन जो एक सदी से विकल था ...चौक जो कई युगों से वहीं-का-वहीं बैठा हुआ था, बुढ़ाता हुआ| बहुत कुछ बदल गया था वैसे तो शहर में...सड़कें चौड़ी हो गई थींसड़क पर साइकिलों-रिक्शों की जगहों को नए-नए मॉडल वाले चरपहिये छेंकने लगे थे बिजेन्द्र भैया की पान की दूकान ने टू-इन-वन को स्टीरियो सिस्टम से पदस्थापित कर दिया था और "जा झाड़ के" बजाय "तेरे मस्त-मस्त दो नैन" बजाने लगी थी और कैप्सटेन-पनामा के अलावा विल्स क्लासिक, ट्रिपल फाइव जैसे बड़े ब्रांड के पैकेट भी रखने लगी थीदो-तीन आइस-क्रीम पार्लर खुल गए थे और उनके पार्किंग स्पेस में स्कूटियों-बाइकों की दिलफ़रेब संगत टीस उठाने लगी थी सामने चाय वाले बाबा के पास जमने वाली शाम की चौपाल में| अब कायदे से इस बदलती रुत में बुढ़ाते चौक की जवानी लौटनी चाहिए थी, लेकिन लौटा कमबख्त बचपन|

      शहर तो खूब फैल गया था...बड़ी लाइन की ट्रेनें भी दिल्ली और कोलकाता से आने लगी थीं| कुछ नेताओं, कुछ शहीदों के नाम पर सड़कों तक का नामकरण हो गया था| लेकिन वो चौक बस चौक ही रहा| चौक- इसी पुकारे जाने में अपनी पूरी पहचान समेटे हुये| ...और उस रोज़ अचानक से उसका बुढ़ाना ठहर गया था| सालों बाद...नहीं, युगों बाद मिले थे वो चारों फिर से उसी चौक पर| कुछ भी पूर्वनियोजित नहीं था| बस एक संयोग बना था छठ पूजा का, व्यस्त जीवन की आपा-धापी में| चारों में से बस बबलू उर्फ बसंत कुमार श्रीवास्तव ही आ॰आई॰टी॰ निकाल पाये थे और फिलहाल दिल्ली में एक किसी नामी प्राईवेट बैंक में लाखों का सालाना कमा रहे थे| मंटू उर्फ मानवेंद्र प्रसाद जर्नलिज़्म का कोई ख्यातिप्राप्त कोर्स करके पटना से निकलने वाले एक बड़े दैनिक समाचार-पत्र का फीचर संवादाता बन गये थे| बेनी माधव झा अपने बड़े भैया की सफलता को दुहरा तो नहीं पाये, लेकिन भारतीय सेना में धार्मिक शिक्षक की भर्ती में कुछ साल पहले ही सफलता पाकर संतुष्ट थे| ...और दीपू उर्फ दीपांकर सिन्हा अपने पिता के कदम-चिह्नों पर चलते हुये उनसे तनिक आगे निकलते हुये राज्य प्रशासनिक सेवा में झंडा गाड़कर बगल के ही प्रखंड में बी॰डी॰ओ॰ की कुर्सी पर विराजमान हो खूब ऊपरी आमदनी कमा रहे थे और अपनी बहन मीनू उर्फ मीनाक्षी सिन्हा की शादी खूब सारा दहेज देकर पटना के एक आई॰ए॰एस॰ से करवा चुके थे|

      छठ पूजा की वो संध्या...डूबते सूरज को अर्घ्य अर्पित करने के बाद चारों फिर से इकट्ठा हुये चौक परयुगों पहले साथ-साथ देखे हुये चितकबरे ख़्वाबों को फिर से एक बार जी लेने के लिये बड़े हो कर कुछ कर दिखाने का ख़्वाबगर्ल्स स्कूल की खिड़की के उस पार नीम-अँधेरे में झांक लेने का ख़्वाबबायोलॉजी ग्रुप की लड़कियों के ख़्वाबदुनिया नहीं, बस अपने शहर को बदलने का ख़्वाबसाथ-साथ एक अख़बार निकालने का ख़्वाबरणजी ट्राफी के ट्रायल में चयनित होने का ख़्वाबस्टेफी ग्राफ और गैब्रियला सबातीनी के ख़्वाब| एक सदी ही तो बीत गई इस बीच और उन दिनों अपनी जवानी पर इतराता वो चौक, उनके ख़्वाबों में शामिल होता हर रोज़ और दुआएँ करता था उन ख़्वाबों के तामीर की| फिर एक दिन अपने ख़्वाबों की तलाश में चारों जो अलग हुये, तो पीछे छुट गया बस ये चौक और तब से चौक का बुढ़ाना बदस्तूर जारी था| वो भी बड़े हो गए...शहर ने अपना पंख पूरी तरह पसार लिया...इसके अबूझ संस्कारों का बोझ यक-ब-यक हल्का हो गया कि अब गर्ल्स स्कूल की लड़कियाँ बेझिझक गर्दन उठाए चलती हैं...बायोलॉजी ग्रुप वालियाँ दो-तीन बच्चों की मम्मियाँ बन कर अपने अपने-अपने आँगनों में लापता हो गई हैंशहर से कई सारे अख़बार भी निकलने लगे हैं... रणजी ट्रॉफी के ट्रायल ने सिफ़ारिशों के बोझ तले अपना वजूद खो दिया है... स्टेफ़ी को अगासी ले गया और सबातीनी को उसकी अर्जेंटीनियन गर्ल-फ्रेंड|

      ...और उस शाम, युगों बाद उन चारों का मिलना चौक का बचपना ले आया वापस फिर से| जवानी नहीं, बचपना| ट्रिपल फाइव को आसानी से अफोर्ड कर पाने के बावजूद चौक पर फिर से पनामा ही सुलगा| "तेरे मस्त-मस्त दो नैन" को दरकिनार कर चिल्लाते हुये "जा झाड़ के" गाया गया| आइस-क्रीम पार्लर के पार्किंग स्पेस में दिखती स्कूटियों और बाइकों के बहाने बायोलॉजी ग्रुप वाली तमाम लड़कियों पर न सिर्फ विस्तृत चर्चा हुई, बल्कि नथूने फुलाए गए, भृकुटियाँ टेढ़ी की गईं और बाँहें भी चढ़ाई गईं| बाबा की चाय में डस्ट के बजाय लीफ की खुशबू मिली तो बाबा को ढ़ेर सारे उलाहने दिये गए| शहर के बदलने पे खुशी और अफसोस साथ-साथ जताए गए| अख़बारों की स्तरियता पर मुट्ठियाँ लहराई गईं हवा में| रणजी ट्रायल की चर्चा पर पूरी भारतीय क्रिकेट टीम को एक सिरे से गलियाया गया| किन्तु सबसे श्रेष्ठ गालियों का पिटारा आन्द्रे अगासी के लिए खोला गया जो उनकी दिलरुबा स्टेफ़ी को ले भागा था...और अंत में सबातीनी के लेस्बियन निकलने की खबर पर दो मिनट का मौन रखा गया|

      चौक उस सामूहिक मातम में बाकायदा शामिल था अपने बुढ़ापे को बिसराए हुये, बच्चा बना हुआ|




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